Monday, 20 June 2016

गहराई

सागर की जो गहराई है,
चढ़ आसमान में छाई है,
यूँ दूर समन्दर उठता जो,
क्यूँ आसमान को भायी है।
हम लोग समन्दर होते हैं,
मन में जो कुछ भी बोते हैं,
गहराई में सब जाता है,
क्यों निकल नहीं वो पाता है।
दुनियाँ का ये जंजाल उसे,
क्यों रोज़ डुबाये जाता है,
ग़म की क्यारी लहराती है,
ख़ुशियों को रोज़ डुबोती।
सब खारापन क्यूँ लगता है,
जब यूँ गहराई में देखूँ,
वो पिघला हुआ पड़ा है जो,
बोया था मन में अन्जाने।
जब लहरों की हुँकार शुरू,
होने लगती कुछ होता है,
जब मन में हलचल तेज़ हुई,
लहरों में गीत सुनाता है।
सब सों-सो करके भर जाता,
गहराई लिये बताता है,
मन जो कुछ भी उम्मीद करे,
गहराई से सब आता है।
हम जो कुछ भी बो देते हैं,
गहराई में सब जाता है,
यूँ दूर समन्दर उठता जो,
वो आसमान हो आता है।
कानू..

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