Thursday, 23 March 2017

जहाज की खिड़की से

जहाज की खिड़की से 

धीर-धीरे है रेंग रही ,
खिड़की से दिखता है दूर ,
निकल पड़ी है ये जहाज ,
अब तो जाना है काफी दूर,
खड़बड़-खड़बड़ शुरू हुआ,
कान भी सर-सर होते हैं ,
ये देखो अब छोड़ चली है,
धरती नीचे जाती क्या ख़ूब।
क्या ख़ूब नज़ारे उपर के,
सब दिखता दूर-दूर तक है ,
नीचे की दुनियाँ सिमट रही ,
उपर जो है विस्तार लिये,
सब छोटे-छोटे हुए चले ,
नीचे के सभी विकास हुए,
सब समतल हो के हुए पड़े,
कुछ छोटा-बड़ा नहीं है क्यों।
हरियाली है,उजियारी है,
या सागर की करियायी है,
वो दूर पहाड़ जो दिखता है,
सब सिनरी का है सीन लिये,
कुछ और ऊँचाई होती है,
खेती-बारी अब दिखती है,
बचपन के बुढ़िया माई की,
रूई सब यहीं सिमटती है।
है उजला-उजला खेत यहाँ,
चकचौंध में डाले है मुझको,
बादल ही हैं या रूई हैं ये,
यह बात समझ न आ पाती,
सब वैसे ही रक्खे हैं जो,
बचपन में जिसे छेकाया था,
कहीं वो पहाड़ बचपन वाला,
है ठीक वो थोड़ी दूर पड़ा ,
और साथ है वो डाइनवासोर,
डरते जो देख कर सारे।
कुछ आगे को है और चली,
बादल की झुक-झुक टोली है,
निचे भी साफ झलकता है,
सागर की लहर चमकती है,
अब आने लगे पहाड़ नये,
कुछ सूनापन सा लगता है,
मिट्टी भी हुयी नारंगी सी,
तन्हाई सी अब लगे मुझे,
हम छोड़ चले धरती अपनी,
परदेश में अब हम उड़े चले,
सब नयी सजावट लगती है,
हर ओर नयापन है भारी।                                 
                                  कानू..


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