Thursday, 23 March 2017

कौड़ा

याद हुइ बचपन की बातें, 
जाड़े के मौसम की रातें,
सूरज ढलने के पहले ही,
कौड़े को सुलगाती बातें। 
            सूरज ढलते-ढलते जैसे,
            कुहरे ने डाला है डेरा,
            कुहरे में वो महक अनोखी,
           आलस कर देती है फीकी।
मफलर-टोपी और दुशाले,
बाँध चले बप्पा के दुवारे,
कौड़े की लपटें दिखती हैं,
वहीं चले है सब मतवाले।
           अभी फराकत को जाने हैं,
           जावें वो लौटें फिर आवें,
           हाथ धुलें लोटे मटियावें ,
           बैठें फिर कुछ हाल सुनावें।
पुवरे को कुछ गाजा है जो,
धूँ-धूँ लपट और इतराये,
हाथ सेंक कुछ गरमी आए,
पैर सेंक कर फुर्ती आए।
           बच्चे भी कुछ बैठे हैं जो,
           आग सेंक लुत्ती मन भावे,
           आलू-गंजी लिये हाथ में ,
           भूजें फिर खोदें फिर खावें
बड़े-बुज़ुर्ग साथ बैठे हैं,।
अपनी-अपनी कहे-बतावें,
अन्तिम तक कोढ़ी बैठे हैं,
बुझी अाग पर राहत पावें।
                               कानू..


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