Thursday, 23 March 2017

नानी

नानी 


मित्रों आज फेसबुक पर एक मित्र की पोस्ट के फोटो में
 मिट्टी की चूल्ह,चौका - बेलना , साना हुआ आटा और ठीक 
चूल्ह के बग़ल में कुछ हरेट्ठा गजा था।अपने बचपन की
 तस्वीरें ताजा होकर तैरने लगीं....जिनमें नानी चूल्ह पर
 रोटी और गोझिया बना रही है, मताजी गाँव के मिट्टी - खपड़े
 वाले घर में लौकी का जाबर(लौकी,दूध,चावल मिक्स),पूड़ी-तरकारी
 बना रही हैं.......आज नानी जी नहीं हैं, खपड़े का घर नहीं है 
और मिट्टी की चूल्ह भी नहीं है.....
पेश है कुछ लाइनें....

जब उठ भिन्सहरा बड़े सुबह,
चूल्हा-चौका लिप जाती थी,
नानी मेरी जब सुबह-सुबह ,
सब पूजा-पाठ पढ़ जाती थी।
काली माई,डीह बाबा,
सूरज भगवान,देवरहवा बाबा,
शंकर जी ,ब्रह्मा जी और
विष्णु जी से चक्र गिराती थी,
जब उठ भिन्सहरा बड़े सुबह,
नानी मेरी कुछ गाती थी।
जब साफ-सफाई हो पूरी,
तब ही चौके में आती थी,
रोटी-सब्जी और दाल-भात,
चूल्हे पर जल्द पकाती थी,
हम भूखे हैं,हम ललचे हैं,
नानी सब देख समझती थी,
सबजी छौंकाने के पहले,
गुझिया भी छान बनाती थी,
हतपोई रोटी के संग में,
भेली और सोंठ मिला करके,
दो मीठे रोट पकाती थी।
जब शाम ढले सूरज डूबे,
नानी हमें पास बुलाती थी,
अंधेरे में हम इधर-उधर,
कहीं दूर नहीं जाने पावें,
कही सटे न हों हम खम्भों से,
कहीं हों न डेहरी कोने में,
नानी की चिन्ता रहती थी,
हम दूर नहीं जाने पावें।
जब सोने हम लग जाते थे,
नानी तब तेल लगाती थी,
कभी आटे-सरसों का बुकवा,
नानी हमें खूब लगाती थी।
किस्से की जिद्द जो होती तो,
सोनचिरैया खूब सुनाती थी,
कौवा हकनी की क़िस्से में,
कुछ रोने भी लग जाती थी।
जब गंगाजी को जाती थी,
लाई-गट्टा ले आती थी,
छोटा-छोटा लाकेट जैसा,
धागे में माला लाती थी।
गंगाजी की परसादी को,
कुछ नीचे जो रख देतीथी,
हम भरथैली और मुट्ठी को,
ले भाग ठिकाने जाते थे,
कुछ खाते थे खिलवाते थे
मित्रों में चहक मनाते थे।
जब बड़े सबेरे उठ करके,
नानी मेरी कुछ गाती थी।
                                कानू..


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